
दोस्ती: जब रिश्ता एहसास बन जाता है
जीवन के सफर में कई लोग आते हैं, कुछ साथ चलते हैं, कुछ रास्ते में छूट जाते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सिर्फ साथी नहीं, हमारी ताकत बन जाते हैं। वे बिना कुछ कहे, बिना कुछ जताए हमारे सुख-दुख में ऐसे शामिल हो जाते हैं जैसे वे खुद उस तकलीफ या खुशी को जी रहे हों। यही वो रिश्ता होता है जिसे हम “सच्ची दोस्ती” कहते हैं।
बीते कुछ दिन मेरे लिए किसी इम्तिहान से कम नहीं थे। अस्पताल की सफेद दीवारें, ICU की मशीनों की आवाज़, और दर्द से भरे वे अनगिनत पल—इन सबके बीच अगर किसी चीज़ ने मेरा हौसला बनाए रखा, तो वह था मेरे सच्चे दोस्त का साथ। जब शब्द फीके पड़ गए थे, तब उसकी खामोशी भी मेरा संबल बनी। जब शरीर कमजोर हो गया था, तब उसकी हिम्मत मेरी ताकत बनी। उसने दोस्ती को महज़ एक रिश्ता नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी समझा—हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रखा, परिवार की तरह ख्याल रखा, और बिना किसी स्वार्थ के हर संभव प्रयास किया कि मैं जल्द से जल्द ठीक हो जाऊं।
आज सिर्फ मेरा नहीं, बल्कि उसी सच्चे दोस्त का भी जन्मदिन है। यह महज़ एक तारीख नहीं, बल्कि उस अटूट विश्वास और बेमिसाल रिश्ते का जश्न है, जिसे हम दोस्ती कहते हैं। यह दिन मुझे याद दिलाता है कि इस दुनिया में सच्चे रिश्ते पैसे से नहीं, भावनाओं से बनते हैं। दोस्ती वही होती है, जो हर परीक्षा में खरी उतरे, जो शब्दों से नहीं, काम से महसूस हो, और जो वक्त के साथ और मजबूत होती जाए।
इस खास दिन पर मेरी यही दुआ है कि तुम हमेशा खुश रहो, तुम्हारी जिंदगी कामयाबी और खुशियों से भरी रहे। तुम्हारी तरह हर किसी को एक ऐसा दोस्त मिले जो बिना किसी स्वार्थ के दोस्ती निभाए।
