
बाकी मोगरा।
कहते हैं, इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं, दिलों में भी लिखा जाता है। और 15 अगस्त 2025 की सुबह, बाकी मोगरा के इतिहास में वो सुनहरा पन्ना जुड़ गया जिसे पीढ़ियां याद रखेंगी।
फ्लैशबैक में लौटते हैं…
वो दिन याद कीजिए, जब यहां की राजनीति में दलों के बीच की खाई इतनी गहरी थी कि एक मंच पर खड़े होने की कल्पना भी असंभव थी। सत्ता पक्ष अपने काम का गुणगान करता, विपक्ष उसकी आलोचना में जुटा रहता। लेकिन बाकी मोगरा अलग था — यहां सत्ता के अपने कार्यकर्ता भी अगर कुछ गलत दिखे तो आवाज उठाने से पीछे नहीं हटते। यही तो है असली “जनतंत्र की ताक़त”।
और फिर… 2025 का स्वतंत्रता दिवस आया।
तारीख़ वही थी, पर माहौल बदला हुआ था। नगर पालिका अध्यक्ष सोनी कुमारी झा के नेतृत्व और उनके जीवनसाथी, भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष विकास झा की प्रेरणा से, पूरा नगर एक साथ आया — न कोई ‘पक्ष’, न कोई ‘विपक्ष’, बस एक ‘भारत’।
विकास झा – वो युवा नेता, जिसने फर्क पैदा किया
भीड़ के बीच जब सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहने, सीना ताने, आंखों में चमक और चेहरे पर गर्व लिए विकास झा मंच की ओर बढ़े, तो मानो एक लहर सी दौड़ गई। उनके हाथों में तिरंगा था, पर उस तिरंगे के साथ चल रहा था एक संदेश — स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ अंग्रेज़ों से आज़ादी नहीं, बल्कि सच बोलने, गलत का विरोध करने और सही के साथ खड़े होने की आज़ादी है।
सोनी कुमारी झा – वो प्रेरणा, जिसने शहर को जोड़ा
मंच के पीछे खड़ी सोनी कुमारी झा की आंखों में चमक थी। यह वही महिला थीं, जिन्होंने बाकी मोगरा की गलियों से लेकर नगर पालिका के दफ्तर तक, हर जगह लोगों को यह यक़ीन दिलाया कि “हम सब एक हैं”। उनके नेतृत्व में, बाकी मोगरा ने पहली बार स्वतंत्रता दिवस पर एक ऐसा झंडारोहण देखा, जिसमें सिर्फ राजनीतिक नेता ही नहीं, बल्कि आम जनता, व्यापारी, मजदूर, महिलाएं और बच्चे — सभी एक साथ थे।
और फिर आया वो पल…
सुबह 8 बजे, विकास झा ने जब राष्ट्रीय ध्वज फहराया, तो शंखनाद, ढोल-नगाड़े और ‘भारत माता की जय’ के नारों ने पूरे नगर को गूंजा दिया। तिरंगा हवा में लहर रहा था, और साथ ही लहरा रहा था बाकी मोगरा का स्वाभिमान।
लोगों की आंखों में आंसू थे — किसी ने इतने सालों में पहली बार ऐसा दृश्य देखा था, जहां कोई राजनीतिक रैली नहीं, बल्कि सच्चा राष्ट्रीय पर्व मनाया जा रहा था।
यह था असली स्वतंत्रता दिवस
बाकी मोगरा में यह दिन सिर्फ एक तारीख़ नहीं था — यह उस सोच का प्रतीक था, जहां सत्ता और विपक्ष दोनों ही जनता के लिए खड़े होते हैं, और जहां हर दिल में तिरंगे के लिए एक जैसी धड़कन होती है।
इस ऐतिहासिक दिन का श्रेय निस्संदेह सोनी कुमारी झा और विकास झा को जाता है — एक ऐसी जोड़ी, जिसने दिखा दिया कि अगर नीयत साफ हो, तो राजनीति भी राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा हथियार बन सकती है।
