
✍️ लेखक: प्रियांशु मल्होत्रा
कबीरधाम, छत्तीसगढ़।
आज के समय में जब शिक्षा अक्सर पैसों की दौड़ में उलझ जाती है, वहीं छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले से एक ऐसी प्रेरक कहानी सामने आई है जिसने पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है। यहाँ के सरकारी स्कूल में पदस्थ शिक्षक पूनाराम पनागर, जिन्हें लोग प्यार से “सैलून वाले गुरुजी” कहते हैं, बच्चों की जिंदगी बदलने में जुटे हैं।
जी हाँ, यह वही गुरुजी हैं जो बच्चों को किताबों का ज्ञान तो देते ही हैं, साथ ही खुद कैंची और कंघी उठाकर उनके बाल भी काटते हैं। ताकि बच्चे बाल कटिंग पर खर्च होने वाला पैसा बचाकर कॉपी-किताब और पढ़ाई से जुड़ी ज़रूरी चीज़ें खरीद सकें।
13 साल पहले उठाया अनोखा कदम
पूनाराम ने यह सेवा 2012 में शुरू की थी। उस समय उनकी पोस्टिंग आदिवासी बहुल महलीघाट गांव के प्राथमिक विद्यालय में हुई थी। गांव इतना पिछड़ा था कि वहाँ सैलून तक नहीं था। बच्चे महीनों तक बाल नहीं कटवाते थे और अस्त-व्यस्त रहते थे। यह देखकर उन्होंने खुद ही बच्चों के बाल काटने का बीड़ा उठाया।
तब से यह परंपरा आज तक जारी है। चाहे प्राथमिक स्कूल हो या मिडिल स्कूल—सैलून वाले गुरुजी बच्चों के लिए हर महीने का एक रविवार “बाल कटिंग दिवस” बना चुके हैं।
✂️ शिक्षा के साथ सेवा का संगम
कक्षा के अंदर वे गुरुजी, और कक्षा के बाहर नाई। दोनों भूमिकाएँ निभाकर वे बच्चों को यह सिखाते हैं कि शिक्षक सिर्फ़ पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि जीवन सँवारने वाला होता है।

वे बच्चों से कहते हैं—
“पढ़ाई से बड़ा कोई धन नहीं है। बाल कटाने में पैसे मत उड़ाओ, वही पैसे पढ़ाई पर लगाओ।”
मुफ्त कोचिंग और टॉपरों को इनाम
पूनाराम सिर्फ़ बाल काटकर ही नहीं रुकते। वे बच्चों को अतिरिक्त समय देकर मुफ्त कोचिंग भी देते हैं। प्रतियोगिताएँ करवाते हैं और जो छात्र जिला या प्रदेश स्तर पर टॉपर बनते हैं, उन्हें अपनी जेब से 10 से 15 हज़ार रुपये तक का इनाम भी देते हैं।
यह उनकी सोच ही है कि बच्चे आगे बढ़ें, गरीब परिवारों के सपने टूटें नहीं बल्कि उड़ान भरें।
समाज में मिसाल
उनके साथी शिक्षक कृष्ण कुमार धुर्वे कहते हैं—
“पूनाराम सर बच्चों की शिक्षा को लेकर बेहद सजग हैं। उनका हर प्रयास बच्चों की ज़िंदगी बदलने के लिए है।”
आज पूनाराम पनागर न सिर्फ कबीरधाम जिले बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ और देश के लिए प्रेरणा बन गए हैं।
निष्कर्ष
आज जब शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, ऐसे में “सैलून वाले गुरुजी” की कहानी उम्मीद की किरण देती है। यह साबित करती है कि असली शिक्षक वही है, जो बच्चों के जीवन को सिर्फ़ किताबों से नहीं बल्कि अपने कर्म और सेवा से सँवारे।
पूनाराम पनागर सचमुच शिक्षा जगत के “हीरो” हैं — और उनकी यह कहानी हर उस दिल को छू लेती है जो सच्चे गुरु की तलाश में है।
